कुतुब मीनार से भी ऊंचा है गिरौधपुरी का जैतखाम, जानिए खास बातें

रेशम वर्मा की रिपोर्ट कसडोल- आज सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास जयंती है. इस मौके पर गिरौदपुरी धाम में मेले का आयोजन किया जाएगा. गिरौदपुरी धाम विशेषकर यहां बने जैतखाम के लिए जाना जाता है. जिसे देखने दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है, जहां कई धार्मिक स्थल हैं. इन्हीं
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कुतुब मीनार से भी ऊंचा है गिरौधपुरी का जैतखाम, जानिए खास बातें

रेशम वर्मा की रिपोर्ट

कसडोल- आज सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास जयंती है. इस मौके पर गिरौदपुरी धाम में मेले का आयोजन किया जाएगा. गिरौदपुरी धाम विशेषकर यहां बने जैतखाम के लिए जाना जाता है. जिसे देखने दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.

छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है, जहां कई धार्मिक स्थल हैं. इन्हीं में से एक है गिरौदपुरी धाम. जोंक नदी के संगम पर स्थित गिरौदपुरी धाम बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखंड के अंतर्गत स्थित है. पवित्र धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ यह जगह छत्तीसगढ़ में सतनामी पंथ के संस्थापक श्री गुरु घासीदास जी की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है. इसके अलावा यहां पर स्थापित जैतखाम लोगों के आकर्षण का केंद्र है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.

गिरौदपुरी धाम का इतिहास

गिरौदपुरी का आध्यात्म और इतिहास से बहुत गहरा नाता रहा है. यहां देश-विदेश से पर्यटक आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में आते हैं. बाबा गुरु घासीदास ने साधारण किसान परिवार में जन्म लिया था. इनके पिता का नाम मंहगू, माता का नाम अमरौतिन और पत्नी का नाम सफुरा था. जैतखाम के ठीक बगल में आज भी उनके बैठने का स्थान स्थापित है. ऐसा भी कहा जाता है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने औराधरा वृक्ष के नीचे तपस्या की थी, जो अब तपोभूमि के नाम से प्रचलित है.

पूरे देश से जैतखाम को देखने आते हैं श्रद्धालु

गिरौदपुरी धाम जैतखाम जैसी शानदार संरचना के लिए भी जाना जाता है. इंजीनियरिंग का करिश्मा कही जाने वाली यह 77 मीटर ऊंची संरचना देखने में वाकई अद्भुत लगती है. सतनामी संप्रदाय के शाश्वत प्रतीक के रूप में पूरी दुनिया को लुभाती विश्व की ये सबसे ऊंची मीनार है. जैतखाम इतना आकर्षक है कि दूर-दूर से लोग इसे देखने के लिए आते

बाबा गुरु घासीदास की जन्मस्थली गिरौदपुरी, जहां विशाल स्तंभ ‘जैतखाम’ का निर्माण किया गया है. यह स्तंभ दिल्ली की कुतुब मीनार से भी ज्यादा ऊंची है. यह स्तंभ कई किलोमीटर दूर से ही दिखने लगती है. सफेद रंग के इस स्तंभ का वास्तुशिल्प इतना शानदार है कि दर्शकों की आंखें इस पर ठहर जाती हैं. दिन ढलते ही दूधिया रोशनी में जैतखाम की भव्यता देखते ही बनती है.

इस तरह की डिजाइन जयपुर के जंतर-मंतर और लखनऊ की भूलभूलैया में भी इस्तेमाल की गई है. गिरौदपुरी की छत पर जाने के लिए दो लिफ्ट भी हैं. जैतखाम के चारों ओर खूबसूरत गार्डन हैं. गार्डन को देशी-विदेशी फूलों से सजाया गया है. गार्डन का विस्तार आगरा के ताजमहल और दिल्ली के मुगल गार्डन की तर्ज पर किया जा रहा है. कुतुब मीनार से ज्यादा ऊंचे इस जैतखाम को बनाने की योजना अजीत जोगी की सरकार ने तैयार की थी, पर उसे अमली जामा रमन सिंह सरकार ने कराया था ।

सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा गुरु घासीदास का जन्म गिरौदपुरी में करीब ढाई सौ साल पहले, 18 दिसंबर 1756 को हुआ था. उन्होंने गांव के नजदीक छाता पहाड़ पर कठिन तपस्या की और अपने आध्यात्मिक ज्ञान के जरिए सत्य, अहिंसा, दया, करुणा, परोपकार की शिक्षा देकर सत्य के मार्ग पर चलने का लोगों को संदेश दिया. उनसे पीढ़ियों को प्रेरणा मिलती रहे। .

1935 से लगता है मेला

लोगों का कहना है कि समाज की ओर से जगद्गुरू गद्दीनशीन स्वर्गीय अगम दास ने 1935 में माघ-पूर्णिमा के दिन गुरु दर्शन मेले की शुरुआत की थी. कुछ लोगों का मत है कि मेला इससे भी पहले भी लगता था, लेकिन गुरु अगम दास ने इसे जनसहयोग से अधिक व्यवस्थित रूप दिया था. करीब तीन दशक बाद 1966 में समाज प्रमुखों की आम सहमति से गुरु दर्शन मेला हर साल फाल्गुन शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक आयोजित होता है.

रायपुर से 145 किलोमीटर की दूरी पर है गिरौदपुरी धाम

गिरौदपुरी धाम बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर और राजधानी से 145 किलोमीटर दूर है. महानदी कछार में स्थित बलौदाबाजार-भाटापारा जिले का यह छोटा सा गांव 18वीं सदी के महान समाज सुधारक गुरु बाबा घासीदास की जन्मभूमि और तपोभूमि है. गुरु दर्शन मेले के अलावा पूरे साल आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए इस जगह पर पगडंडियां नहीं, बल्कि साफ-सुथरी चौड़ी और पक्की सड़कें बनाई गई हैं. हर साल लाखों श्रद्धालु जैतखाम को देखने और बाबा गुरू घासीदास के आशीर्वाद के लिए यहां आते हैं।