एक तरफ  देश की सुरक्षा का सवाल तो दूसरी ओर देव परंपरा के निर्वहन की चिंता

मनोज उनियाल की रिपोर्ट भारत-चीन युद्ध के चलते ब्लैकआउट हो गई थी देवभूमि, इस बार सिर्फ निभाई जाएंगी देव परंपराएं कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव पर कई बार संकट के बादल छाते रहे हैं। यहां के अठारह करडु देवी-देवताओं ने इस संकट से अपनी प्रजा को निकालने का भरकस प्रयास किया है। इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो
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एक तरफ  देश की सुरक्षा का सवाल तो दूसरी ओर देव परंपरा के निर्वहन की चिंता

मनोज उनियाल की रिपोर्ट

भारत-चीन युद्ध के चलते ब्लैकआउट हो गई थी देवभूमि, इस बार सिर्फ निभाई जाएंगी देव परंपराएं

कुल्लू।  अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव पर कई बार संकट के बादल छाते रहे हैं। यहां के अठारह करडु देवी-देवताओं ने इस संकट से अपनी प्रजा को निकालने का भरकस प्रयास किया है।  इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो 1651 ईसवी में शुरू हुए दशहरा उत्सव के बाद 1962 में चीन युद्ध के दौरान भी दशहरा पर्व पर महासंकट आ गया था। युद्ध के डर से पूरी देवभूमि ब्लैकआउट थी और किसी को भी रोशनी करने की इजाजत तक नहीं थी, ताकि चीन के लड़ाकू विमान जनसंख्या वाले इलाकों पर बमबारी न कर सकें। हालांकि इस बार कोई युद्ध जैसे हालात नहीं हैं, पर कोरोना महामारी के चलते इसी तरह की स्थिति बनी  कि क्या दशहरा पर्व मनाया जाए या नहीं।

बताया जाता है कि इस दौरान भी एक तरफ  देश की सुरक्षा का सवाल था और दूसरी ओर देव परंपरा के निर्वहन की चिंता। उस दौरान भी देव परंपरा को निभाया गया था। जानकार बताते हैं कि जैसे ही रथयात्रा शुरू हुई, तो देश के लिए बड़ी राहत भरी खबर थी। एक तरफ भगवान की रथयात्रा का नजारा था, तो दूसरी ओर चीन के साथ युद्ध विराम की घोषणा हुई थी और सायंकाल रेडियो से इसकी विधिवत जानकारी मिली कि  चीन के साथ युद्ध खत्म हो गया है। लिहाजा दशहरा पर्व धूमधाम के साथ मनाया और देश का खतरा भी टल गया साथ ही लोगों की देव आस्था भी बढ़ी। इसी तरह एक बार फिर 1971 में लंका दहन के दिन दशहरा पर्व में गोलीकांड हुआ था और 1972 में दशहरा रघुनाथपुर तक ही सीमित रहा था। इसका कारण यह था कि ढालपुर मैदान हत्या के कारण अशुद्ध हुआ था और अशुद्ध जगह पर देव कार्य नहीं होते, जब तक उसकी शुद्धि नहीं हो जाती। वर्ष 2001 में धुर विवाद के चलते लाठीचार्ज भी हुआ था, लेकिन दशहरा पर्व की परंपराएं नहीं रुकीं।  अब भी देव परंपरा नहीं रुकेगी। देव पंरंपरा का निर्वहन दशहरे में होगा।

सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल

मंत्री गोविंद ठाकुर ने भी साफ कहा कि भगवान रघुनाथ जी की शोभायात्रा के साथ ही दशहरे का शुभांरभ होगा। सात दिन तक रघुनाथ जी अस्थायी शिविर में बैंठेगे। उस दौरान भी जो पुजारी पूजा पर होंगे, उन सभी के सुरक्षा सहित भगवान के दर्शन करने आने वाले भक्तों के बीच भी सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन किया जाएगा। दशहरे में पहली बार होगा कि कोई भी वीवीआईपी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित नहीं होगा और न ही किसी को इसके लिए निमंत्रण पत्र भेजे गए हैं।