चिकन कारोबार पर भी पड़ा कोरोना का कहर, व्यापारी परेशान

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शशांक तिवारी की रिपोर्ट

लखनऊ। देश का इकलौता शहर है लखनऊ जहां चिकन खाया और पहना भी जाता है। दोनों ही यहां की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार हैं। लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण और लॉकडाउन ने इन दोनों की कमर तोड़ दी है।

चिकन बिरयानी, चिकन कबाब से लोगों ने तौबा कर लिया है। इन लजीज व्यंजनों को कोई पूछ नहीं रहा। उधर, चिकन के गारमेंट भी गोदामों में डंप पड़े हैं। बंदी में कारीगर कुर्ता,कमीज, डिजायनर शर्ट बना तो रहे हैं लेकिन इनका कोई खरीदार नहीं है। अकेले लखनऊ में ही 1000 करोड़ से ज्यादा का चिकन का कपड़ा लॉक हो गया है। रमजान और गर्मी के सीजन में चिकन के कपड़ों के निर्यात आर्डर भी रद हो रहे हैं। जिससे चिकन कारोबारियों की हालत खराब हो गयी है।

गांवों तक फैला कारोबार

लखनऊ, बाराबंकी, हरदोई और सीतापुर के ग्रामीण अंचलों तक चिकन का कारोबार फैला हुआ है। गांवों में महिलाओं और लड़कियों के लिए दरदोजी आजीविका का मुख्य साधन है। घर बैठे यह चिकन के कुर्ता, साड़ी, शर्ट आदि में कढ़ाई का काम करती हैं। कपड़ों में कढ़ाई के बाद इन कपड़ों को सिलने के पास दर्जियोंं के पास भेजा जाता है। धुलाई और कलफ के बाद इन्हें थोक व्यापारियों के पास बिक्री के लिए भेजा जाता है।

सऊदी अरब, अमरीका से आर्डर कैंसिल

गर्मी की शुरुआत होते ही चिकेन के कपड़ों की डिमांड बढ़ जाती है। गर्म मौसम में सूती और हल्के चिकन के कुर्ता, पायजामा, साड़ी और सलवार शूट आदि पहनने में काफी आरामदायक होते हैं। इन कपड़ों की मांग न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी खूब है। गल्फ कंट्रीज के अलावा, अफ्रीका, अमरीका और ब्रिटेन तक करोड़ों का चिकन निर्यात किया जाता है। लेकिन कोरोना की वजह से इस बार विदेश माल भेज पाना संभव नहीं है। इसलिए हर रोज लाखों के आर्डर कैंसिल हो रहे हैं। कमोबेश यही हाल, उप्र और देश के अन्य हिस्सों का भी है। व्यापारियों का कहना है कि देश-विदेश को मिलाकर अब तक कुल एक हजार करोड़ के आर्डर कैंसिल हो चुके हैं।

व्यापारियों में निराशा, कैसे करें कारीगरों को भुगतान

माल सप्लाई न होने से कारोबारी निराश हैं। गोदामों में करोड़ों का माल डंप है। कारीगरों को उनकी मजदूरी का भुगतान करना है लेकिन माल सप्लाई न होने से उनका पैसा फंस गया है। छोटे कारोबारियों को बैंक से भी मदद नहीं मिल रही। अधिकतर व्यापारी कपड़ा मिलों से उधारी में माल उठाते हैं और तैयार माल की बिक्री के बाद बैंकों को अदा करते हैं। बैंक का ब्याज बढ़ रहा है लेकिन, माल कहीं बिक नहीं रहा। उधर, कारीगर भी मजदूरी मांग रहे हैं। मजदूरी न मिलने से तमाम करीगरों में भुखमरी की नौबत आ गयी है।

क्या कहते हैं व्यापारी 

अकेले राजधानी लखनऊ में ही 500 थोक कारोबारियों के शोरूम हैं। इिन सभी ने रेडीमेड गारमेंट और चिकन का स्टॉक जमा कर रखा था। 70 प्रतिशत सेल रमजान और गर्मियों के महीने में होती है। तैयार माल डंप पड़ा है। निर्यात आर्डर रद हो रहे हैं। देश में भी सप्लाई की कोई गुजांइश नहीं दिख रही। कम से कम 1 हजार करोड़ के नुकसान का अंदेशा है। राज्य सरकार को व्यवसायियों को राहत पैकेज देना चाहिए।

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