दो बदन एक जान वाली नायाब मिसाल कायम की इस जोड़ी ने

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अनिल अनूप

पूरनचंद वडाली और प्यारेलाल वडाली – पंजाब, भारत में अमृतसर जिले के सूफी गायक और संगीतकार हैं .संगीतकारों की पांचवीं पीढ़ी में जन्मे सूफी संतों के संदेश गाने के लिए मानद दिए गए, वडाली बंधुओं ने सूफी गायक बनने से पहले सबसे अप्रत्याशित व्यवसायों में थे। जबकि पूरनचंद वडाली, बड़े भाई, 25 साल से अखाड़े (कुश्ती रिंग) में नियमित थे, प्यारेलाल ने गाँव रासलीला में कृष्ण की भूमिका निभाते हुए मामूली पारिवारिक आय में योगदान दिया।

प्रारंभिक जीवन

वडाली के पिताजी, ठाकुर दास वडाली , ने  उनको संगीत सीखने के लिए  प्रोत्साह  किया। पूर्वांचल के पटियाला घराने के पंडित दुर्गा दास और उस्ताद बडे ग़ुलाम अली खान जैसे नामी गिरामी संगीतकारों से संगीत का अध्ययन किया। प्यारेलाल को उनके बड़े भाई ने प्रशिक्षित किया था, जिसे वे अपने गुरु मानते थे।

व्यवसाय

उनके गाँव के बाहर उनका पहला संगीत प्रदर्शन जालंधर के हरबल्लभ मंदिर में हुआ था। 1975 में, यह जोड़ी जालंधर में हरभल्लभ संगीत सम्मेलन में प्रस्तुति देने गई, लेकिन उन्हें गाने की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि उनकी उपस्थिति मस्टर्ड नहीं थी। निराश होकर, उन्होंने हरबल्लभ मंदिर में एक संगीत भेंट करने का फैसला किया, जहां ऑल इंडिया रेडियो, जालंधर के एक कार्यकारी ने उन्हें देखा और अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया। वडाली ब्रदर्स ने संगीत के गुरबानी, काफ़िया, ग़ज़ल और भजन शैलियों में गाया। वे गुरु की वडाली में अपने पैतृक घर में रहते हैं, और इसे संरक्षित करने का वादा करने वालों को संगीत सिखाते हैं। वे अपने शिष्यों को चार्ज नहीं करते हैं, और परमात्मा को समर्पित एक बहुत ही सरल जीवन जीते हैं। वे सूफी परंपरा को गहराई से मानते हैं। वे खुद को एक ऐसा माध्यम मानते हैं जिसके माध्यम से महान संतों का उपदेश दूसरों को दिया जाता है। उन्होंने कभी भी व्यावसायिक रूप से काम नहीं किया है, और उनके पास केवल अपने नाम के लिए रिकॉर्डिंग की एक मुट्ठी भर है (ज्यादातर लाइव संगीत कार्यक्रमों से)। वे ईश्वर के लिए स्वतंत्र रूप से गायन में विश्वास करते हैं। वे अपने संगीत में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का उपयोग करने में बहुत सहज महसूस नहीं करते हैं, और आलाप और टैन्स पर जोर देते हैं। वे मानते हैं कि आध्यात्मिक ऊंचाइयों को केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब आप एक मुक्त वातावरण में, अनारक्षित रूप से गाते हैं.

दो बदन एक आवाज 

संगीत जगत में वडाली ब्रदर्स ने नाम कमाने के साथ ही दो बदन एक जान वाली नायाब मिसाल भी कायम की।  जब छोेटे वडाली प्यारे लाल इस दुनिया में नहीं रहे तो संगीत के कद्रदानों ने अफसोस जताने के साथ ही बड़े वडाली यानि उस्ताद पूरन चंद के दर्द को अपने अंदाज में बयां किया।

हिंदुस्तान के गुलाम अली कहलाए नामवर सूफी गायक उस्ताद बरकत सिद्धू के बेटे लाडी सिद्धू बोले कि उस्ताद पूरन तां हुण अधूरे हो गए..। मोगा में अपने स्वर्गीय पिता के नाम पर संगीत अकादमी चला रहे सिंगर व म्युजिक डायरेक्टर लाडी याद करने लगे कि 2012 में जालंधर दूरदर्शन पर इन महान हस्तियों की मुलाकात आज भी याद है। पापाजी (उस्ताद बरकत) और दोनों उस्ताद वडाली ब्रदर्स संगीत जगत की बिगड़ती हालत पर फिक्रमंद हो चर्चा करते उदास थे। तभी जिंदादिल-हंसमुख प्यारेलाल जी ने कोई ऐसी बात कही, सब हंसने लगे और माहौल हल्का हो गया। वो सबके प्यारे थे, सोचिए उनके जाने से बड़े वडाली की तो जैसे बाजू ही टूट गई। फिर लाडी ने एक और वाकया याद किया कि सादगी में जैसे बड़े वडाली हैं, वैसे ही छोटे थे। दिल्ली में एक प्रोग्राम के दौरान पापाजी ने पहले गाया तो उनके साजिंदों के साथ ही वडाली ब्रदर्स गाने को राजी हो गए। एक मौके पर मेरा 10 साल का बेटा रणजीत मिला तो यह जानकर कि उस्ताद बरकत का पोता गाने लगा, उसको प्यारे लाल जी उसको ढेर सारी दुआएं दीं। फिर पापाजी के भोग में आए। जब पापाजी गुजरे तो मैंने एक गीत उनकी याद में लिखकर गाया था, उससे ही उस्ताद प्यारे लाल को श्रद्धांजलि देना चाहूंगा कि छड्ड गिया ओ कल्ला, दुख जिंदगी नूं ला गिया…।

नामवर लोकगायक लालचंद यमला जट्ट से भी वडाली ब्रदर्स का खास लगाव रहा। उनके गायक पोते सुरेश यमला तो पाकिस्तान की प्रसिद्ध लोकगायक जोड़ी मो.सद्दीक व मो.इकबाल से वडाली बंधु की तुलना करते हैं। उनकी ही तरह उस्ताद पूरन चंद की गायकी उस्ताद प्यारे लाल के बिना अधूरी मानी जाएगी। प्यारेलाल जी की मीठी आवाज और हंसमुख मिजाज से उस्ताद पूरन वाकई पूरे माने जाते थे। दोनों भाई दादाजी (उस्ताद यमला) से मिलने के साथ हमारे घर के साथ बने पीर कटोरेशाह के मजार पर भी हाजिरी लगाकर गए। जिनके मजार पर उस्ताद यमला रियाज करके इतने बड़े गायक बने थे।

पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित वडाली बंधु बोले- स्कूल नहीं गए; जो पिता ने सिखाया, वही याद

ढाई दशक तक अखाड़ा ही हमारा सबकुछ था। जमकर पहलवानी की। कई खिताब भी जीते। एक दिन पिता ठाकुरदास वडाली आकर बोले- संगीत सीखना होगा। अब पिता का कहना था तो टाल नहीं सकते थे। पहले उन्होंने ही सिखाया फिर पं.दुर्गादास और उस्ताद बड़े गुलामअली खान पटियाला घराना से स्वर साधना सीखी, जो आज भी जारी है। सूफी गायन में अलग ही मुकाम हासिल कर चुके वडाली बंधु पूर्णचंद आैर प्यारेलाल गुरुवार को शहर में थे। प्यारेलाल की तबीयत खराब होने के कारण वे सुबह गंगाघाट नहीं पहुंच सके। बड़े भाई पूर्णचंद पत्रकारों से बोले- स्कूल नहीं गए, जो पिता ने सिखाया वही याद है। 1975 में जालंधर के गांव हरवल्लभ में पहली बार प्रस्तुति दी थी। वे यहां मौनतीर्थ पर महर्षि मौनीबाबा के 108वें जन्मोत्सव के अवसर पर सूफी गायन की प्रस्तुति देने आए थे।

अवार्ड मिला तो भरोसा नहीं हुआ

1992 में केंद्र सरकार ने संगीत नाटक अवार्ड से सम्मानित किया तो भरोसा ही नहीं हुआ कि जो लोग स्कूल नहीं गए उन्हें सरकार सम्मानित कर रही है। 1998 में तुलसी अवार्ड। 2003 में पंजाब संगीत अवार्ड। 2005 में पूर्णचंद को पदमश्री से अलंकृत किया। उन्होंने पिंजर, धूप, माैसम के साथ तनू वेड्स मनू में भी हुनर दिखाया है।

जुबान पर मत जाइए, सिंधी-पंजाबी में बोलूं तो चलेगा

हिंदी में मेरा हाथ जरा तंग है। मेरी जुबान पर मत जाइए। मैं सिंधी-पंजाबी में बोलूं तो चलेगा। पूर्णचंद वडाली ने यह कहकर सभी का दिल जीत लिया। इसके बाद उन्होंने हर सवाल का जवाब सिंधी-पंजाबी में ही दिया। उन्होंने कहा सूफी गायन की एक विशेषता यह है कि आप भले ही फिल्मी गाने सुनें, आपको यही लगेगा कि प्रार्थना जैसा लग रहा है। असल में सूफी गायन प्रार्थना ही है। संगीत की ऐसी विधा जो आपको सीधेे परमात्मा से जोड़ सकता है ।

बॉलीवुड

2003 में, उन्होंने बॉलीवुड में प्रवेश किया, संगीत निर्देशक और लेखक गुलज़ार के भावपूर्ण गीतों को फिल्म पिंजर में अपने अनोखे अंदाज़ में पेश किया। उन्होंने धोप में एक गाना भी गाया। कार्ड्स पर एक डॉक्यूमेंट्री है जिसे डिस्कवरी चैनल उन पर बनाने की योजना बना रहा है।

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