रसोई का बिगड़ा ज़ायका

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अनिल अनूप

कोरोना संकट से उपजे आर्थिक संकुचन के बीच प्याज की आसमान छूती कीमतों ने उपभोक्ताओं की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। कहने को तो सरकार ने फौरी तौर पर कीमतों पर नियंत्रण की कवायद शुरू कर दी है, मगर कीमतों में कमी होती नजर नहीं आ रही है। प्याज की कीमतों का सौ रुपये तक जाना खरीदारों का बजट बिगाड़ रहा है, लोग खरीद में कटौती कर रहे हैं। दरअसल, अतिवृष्टि से कर्नाटक में प्याज की फसल को भारी नुकसान पहुंचा। इसी प्याज की आपूर्ति सितंबर-अक्तूबर में होती थी। उम्मीद है कि अक्तूबर के अंत तक महाराष्ट्र में होने वाली प्याज की फसल के बाजार में आने के बाद शायद कीमतों में कमी आए। आशंका है कि मौसम की मार के अलावा जमाखोरी की भी कीमतों की वृद्धि में भूमिका हो। अनुमान है कि हाल ही के कृषि सुधारों के क्रम में प्याज को जिस तरह से आवश्यक वस्तु कानून के दायरे से बाहर किया गया, उससे जमाखोरी को बढ़ावा मिला है। यही वजह है कि फौरी तौर पर सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिये स्टॉक लिमिट लगा दी है। अब थोक विक्रेताओं के लिए स्टॉक लिमिट को 25 मीट्रिक टन किया गया है, वहीं खुदरा व्यापारियों के लिये यह मात्रा दो मीट्रिक टन है। लेकिन आयात किये जाने वाले प्याज पर यह लिमिट लागू नहीं होगी।

वहीं दूसरी ओर संकट को देखते हुए सरकार ने प्याज के निर्यात पर रोक लगाने के बाद इसके आयात की अनुमति दी है ताकि मांग व आपूर्ति के संतुलन से प्याज की कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन फिलहाल सरकार के कदमों का प्याज की कीमतों के नियंत्रण पर बड़ा असर नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में प्याज की कीमतों में पड़ने वाले कारणों का समग्र विवेचन करना जरूरी हो जाता है। उन कारकों की पड़ताल भी जरूरी है जो हर साल प्याज की कीमतों में उफान ले आते हैं। दरअसल, भारत में मुख्यत: प्याज की तीन फसलें बाजार में आती हैं। अक्तूबर, दिसंबर और मार्च में आने वाली इन फसलों की आपूर्ति से कीमतों पर नियंत्रण बना रहता है। लेकिन एक भी फसल के बाधित होने से बाजार में कीमतें उछाल मारने लगती हैं। इधर एक घटक यह भी है कि मार्च में आने वाली रबी की प्याज में नमी की मात्रा कम होने के कारण किसान भी बड़े पैमाने पर इसका भण्डारण महाराष्ट्र में करने लगे हैं। इसकी आपूर्ति कर्नाटक के प्याज न आने की स्थिति में अब हो रही है। लेकिन इस वर्ष महाराष्ट्र में भी बारिश से प्याज के भंडारण पर भी खासा प्रतिकूल असर पड़ा है। वहीं कीमतों में उछाल में बारिश के चलते मध्यप्रदेश और गुजरात के स्टोरों में रखे प्याज का खराब होना भी एक वजह बतायी जा रही है। देश में प्याज की खपत 160 लाख टन सालाना है। बीते वर्ष में रबी के प्याज का क्षेत्र सात लाख हेक्टेयर से बढ़कर दस लाख हेक्टेयर हो गया था, लेकिन बारिश की मार ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 

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